सपनों की कोई मैथ्स नहीं होती: 12वीं गणित में 51 नंबर, अब उसी पवन चांदना की दुनिया हुई कायल
चांदना ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें गणित में कभी बहुत अच्छे अंक नहीं आए। 12वीं की बोर्ड परीक्षा में उन्हें मात्र 51
चांदना ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें गणित में कभी बहुत अच्छे अंक नहीं आए। 12वीं की बोर्ड परीक्षा में उन्हें मात्र 51 नंबर ही मिले थे। उन्होंने कहा था कि बचपन में उन्हें गणित से डर लगता था, लेकिन जब आप ब्रह्मांड और तारों को देखते हैं तो डर खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है। आईआईटी-जेईई की तैयारी के दौरान उनकी रुचि गणित में बढ़ी और कड़ी मेहनत के दम पर आईआईटी खड़गपुर में दाखिला लेकर मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। आईआईटी से निकलने के बाद चांदना का चयन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में वैज्ञानिक के रूप में हुआ। यहीं पर उनकी मुलाकात नागा भरत डाका से हुई थी।साल 2018 में देश में निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष के दरवाजे पूरी तरह नहीं खुले थे लेकिन पवन और भरत ने बड़ा जोखिम लिया।
दोनों ने इसरो की प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी को अलविदा कह स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत की। चांदना ने कहा था कि वह इक्विटी का मतलब भी नहीं समझते थे। शुरुआती दिनों में फंड जुटाना चुनौती से कम नहीं था। भरत ने कंपनी के सीओओ के रूप में कमान संभाली और एवियोनिक्स व सॉफ्टवेयर को बेहद कम लागत में तैयार करने की तकनीक विकसित की। पवन ने सीईओ के तौर पर पूरी टीम का नेतृत्व किया।विक्रम-1 की सफलता भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है। इस कामयाबी के ये फायदे हो सकते हैं।स्काईरूट जैसी घरेलू कंपनियों के आने से विदेशी सैटेलाइट कंपनियों को भारत में किफायती, भरोसेमंद और ऑन-डिमांड लॉन्चिंग विकल्प मिलेंगे।देश की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। नए स्टार्टअप को बढ़ावा मिलेगा और बड़े पैमाने पर निवेश और रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे।स्काईरूट का स्कोप सैटेलाइट इस मिशन का अपना एक्सपेरिमेंटल पेलोड है।
इसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में नई तकनीकों की जांच करने व मिलने वाली जानकारी भविष्य के रॉकेट और अंतरिक्ष मिशनों को बेहतर बनाने में मदद करेगी। कॉस्मोसर्व स्पेस के मिशन इमब्रेस में ऐसे रोबोटिक सिस्टम की जांच होगी, जो अंतरिक्ष में घूम रहे बेकार सैटेलाइट व रॉकेट के टुकड़े हटाने में मदद करेगा।ग्रह स्पेस का सोलारस सैटेलाइट भी मिशन का हिस्सा है। इसका मकसद निचली कक्षा में छोटे सैटेलाइट की क्षमता दिखाना है। ऐसे सैटेलाइट कम खर्च में कई तरह के काम कर सकते हैं। कॉस्मिक ब्लूम नामक लैब में बना हीरा भी भेजा गया है। इसे विज्ञान और कला को साथ लाने का एक प्रयास माना जा रहा है।कंपनी ने कमर्शियल लॉन्चिंग की शुरुआत के साथ अपने राजस्व में भारी उछाल का लक्ष्य रखा है। वित्त वर्ष 2026-27 में स्काईरूट को 977 करोड़ का राजस्व मिलने की उम्मीद है।
कंपनी का अनुमान है कि 2031-32 तक उसका राजस्व बढ़कर 13,205 करोड़ तक पहुंच सकता है।स्काईरूट ने मई 2026 में 568 करोड़ (60 मिलियन डॉलर) की नई फंडिंग जुटाई है। इसके बाद इसकी कुल वैल्यूएशन करीब 10,600 करोड़ (1.1 अरब डॉलर) हो गई है और यह भारत का पहला स्पेस-टेक यूनिकॉर्न बन चुका है।स्काईरूट के अगले कुछ वर्षों के ऑर्डर और राजस्व का अनुमानवित्तीय दस्तावेज के अनुसार, स्काईरूट को वित्तीय वर्ष 2027-28 तक स्पेस सिस्टम्स बिजनेस में 605 करोड़ से अधिक के ऑर्डर पूरे करने की उम्मीद है। वहीं मार्च 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, कंपनी के पास ग्राहकों से 252 करोड़ से अधिक का कस्टमर एडवांस (अग्रिम भुगतान) पहले ही आ चुका है।
