डूरंड कप की कहानी: 1888 में शिमला से शुरू हुआ एशिया का सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट, 138 साल की विरासत कैसी?
भारतीय फुटबॉल के इतिहास में कुछ नाम केवल टूर्नामेंट नहीं, बल्कि विरासत बन जाते हैं। डूरंड कप भी ऐसी ही एक विरासत है, जिसने पिछले
भारतीय फुटबॉल के इतिहास में कुछ नाम केवल टूर्नामेंट नहीं, बल्कि विरासत बन जाते हैं। डूरंड कप भी ऐसी ही एक विरासत है, जिसने पिछले 138 वर्षों में केवल विजेताओं को नहीं, बल्कि भारतीय फुटबॉल की पहचान और उसकी संस्कृति को भी आकार दिया है। 1888 में शिमला के अन्नाडेल मैदान में शुरू हुआ यह टूर्नामेंट आज एशिया का सबसे पुराना और दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फुटबॉल स्थापना वर्ष: 1888 1888 स्थापना स्थल: अन्नाडेल, शिमला। अन्नाडेल, शिमला। संस्थापक: सर मॉर्टिमर डूरंड। सर मॉर्टिमर डूरंड। पहचान: एशिया का सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट। एशिया का सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट। वर्तमान संरक्षक: भारतीय सेना की पूर्वी कमान। भारतीय सेना की पूर्वी कमान। वर्तमान स्वरूप: बहु-राज्य और बहु-शहर प्रतियोगिता। आयोजनों में से एक माना जाता है।ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड की पहल पर शुरू हुई इस प्रतियोगिता का उद्देश्य सैनिकों के बीच अनुशासन, टीम भावना और आपसी सौहार्द को बढ़ावा देना था। शुरुआती वर्षों में इसमें केवल सैन्य रेजीमेंटों की टीमें हिस्सा लेती थीं। हिमालय की तलहटी में बसे अन्नाडेल मैदान पर होने वाले मुकाबले सैन्य परंपरा और खेल भावना का प्रतीक माने जाते थे।समय के साथ भारतीय फुटबॉल का विस्तार हुआ और डूरंड कप ने भी खुद को बदलते दौर के अनुरूप ढाल लिया।
सैन्य दायरों से निकलकर इसने भारतीय क्लबों के लिए अपने दरवाजे खोले और यहीं से इसकी कहानी एक नए मोड़ पर पहुंची।वर्ष 1925 में मोहन बागान डूरंड कप में हिस्सा लेने वाला पहला भारतीय नागरिक क्लब बना। हालांकि वह खिताब जीतने में सफल नहीं हो सका, लेकिन उसने यह साबित कर दिया कि भारतीय क्लब भी देश के सबसे प्रतिष्ठित फुटबॉल मंच पर बराबरी से मुकाबला कर सकते हैं।डूरंड कप के इतिहास का सबसे यादगार अध्याय 1940 में लिखा गया। दिल्ली के इरविन एम्फीथिएटर में खेले गए फाइनल में कोलकाता के मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब ने रॉयल वारविकशायर रेजीमेंट को 2-1 से हराकर इतिहास रच दिया। इसके साथ ही मोहम्मडन स्पोर्टिंग डूरंड कप जीतने वाला पहला भारतीय नागरिक क्लब बन गया। उस मुकाबले को देखने के लिए करीब एक लाख दर्शक पहुंचे थे, जो उसदौर के सबसे बड़े खेल आयोजनों में गिना जाता है।स्वतंत्रता के बाद मोहन बागान, ईस्ट बंगाल और मोहम्मडन स्पोर्टिंग जैसे क्लबों ने डूरंड कप को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। खासकर कोलकाता की फुटबॉल संस्कृति और यहां के समर्थकों के जुनून ने इस टूर्नामेंट को नई पहचान दी।डूरंड कप की एक और खासियत यह रही कि आधुनिकता को अपनाने के बावजूद उसने अपनी जड़ों से कभी समझौता नहीं किया।
सेना और सेवा टीमों की निरंतर भागीदारी ने टूर्नामेंट में अनुशासन, सम्मान और खेल भावना की उस परंपरा को जीवित रखा, जिसके साथ इसकी शुरुआत हुई थी।वर्ष 2019 में पूर्वी कमान के संरक्षण में डूरंड कप का नया अध्याय शुरू हुआ, जब इसका केंद्र कोलकाता बना। इसके बाद यह प्रतियोगिता एक शहर तक सीमित न रहकर बहु-राज्य और बहु-शहर आयोजन में बदल गई। पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के कई शहरों तक इसकी पहुंच ने इसे एक वास्तविक राष्ट्रीय फुटबॉल उत्सव का स्वरूप दिया। पहली भारतीय दस्तक, पहली भारतीय जीत 1925: मोहन बागान बना डूरंड कप में खेलने वाला पहला भारतीय नागरिक क्लब। मोहन बागान बना डूरंड कप में खेलने वाला पहला भारतीय नागरिक क्लब। 1940: मोहम्मडन स्पोर्टिंग बना खिताब जीतने वाला पहला भारतीय क्लब। मोहम्मडन स्पोर्टिंग बना खिताब जीतने वाला पहला भारतीय क्लब। फाइनल में रॉयल वारविकशायर रेजीमेंट को 2-1 से हराया गया। मुकाबला देखने पहुंचे थे करीब एक लाख दर्शक। डूरंड कप की तीन ऐतिहासिक ट्रॉफियां डूरंड कप। प्रेसिडेंट्स कप। शिमला ट्रॉफी। डूरंड कप जीतकर फुटबॉल चैंपियन बनने वाली टीम को ये तीनों ट्रॉफियां प्रदान की जाती हैं, जो विश्व फुटबॉल में एक अनूठी परंपरा मानी जाती है।
