पूर्व रेलवे की पहलः जहां होती है 'विरासत से मुलाकात', फिर जीवित हो रही बंगाल की पारंपरिक कला

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Published 5/22/2026, 12:50:16 AM · Updated 5/22/2026, 3:28:07 PMBy TheBriefWire Editorial Team

पूर्व रेलवे की पहलः जहां होती है 'विरासत से मुलाकात', फिर जीवित हो रही बंगाल की पारंपरिक कला

Key points

  • बंगाल के एक दूरदराज के गांव की शांत, धूल भरी गलियों में मिट्टी को थपथपाने की लयबद्ध ध्वनि पीढ़ियों से मयना बरुई के परिवार की पहचान रही है।
  • बचपन से ही उनकी उंगलियां मिट्टी से रंग-बिरंगी “माटिर पुतुल” यानी मिट्टी की गुड़ियां गढ़ती आई हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनके पूर्वज किया करते थे।
  • इन गुड़ियों को बनाना केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा था।...और फिर दिखी आशा की किरण लेकिन समय के साथ दुनिया बदलती गई।
  • बाजार आधुनिक उत्पादों की ओर झुकता गया, मेलों में भीड़ घटने लगी और पारंपरिक कला धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई।
  • एक समय ऐसा आया जब मयना और उनके जैसे कई कारीगरों को लगने लगा कि उनकी पीढ़ियों पुरानी कला शायद अब जीवित नहीं रह पाएगी।

Published May 22, 2026.


📌 Source: Amar Ujala

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